आर्थिक रूप से मजबूत और स्वच्छता में अग्रणी शहर इंदौर अब गंभीर जल संकट और पानी की गुणवत्ता के खतरे से जूझ रहा है। 78 किलोमीटर दूर से लाने पर हर साल 300 करोड़ रुपये से अधिक बिजली खर्च करने के बावजूद शहर की जल व्यवस्था सवालों के घेरे में है। शहर की केवल करीब 70 प्रतिशत आबादी तक ही पानी पहुंच पा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि सप्लाई का 25 30 प्रतिशत पानी लीकेज में ही बह जाता है, जिससे वितरण व्यवस्था की खामियां साफ उजागर हो रही हैं।

पानी की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल-भगीरथपुरा घटना के बाद पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता और बढ़ गई है। हाल ही में लिए गए 26 सैंपलों में से 14 दूषित पाए गए, जो यह दर्शाता है कि शहर का पेयजल पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दिसंबर 2025 से अब तक शहर का लगभग 50 प्रतिशत भूजल दूषित हो चुका है। इसके पीछे कई बड़े कारण सामने आए हैं- 50-60 साल पुराने जर्जर ट्यूबवेल और पाइपलाइन। ड्रेनेज और सीवेज का पानी मिलना। सांवेर रोड, पलदा और भगीरथपुरा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले केमिकल नदियां भी बनीं प्रदूषण की वजह बन रहा है। जहां आमतौर पर नदियां भूजल को रिचार्ज करती हैं, वहीं इंदौर में कान्ह और सरस्वती नदियां उल्टा भूजल को प्रदूषित कर रही हैं। इनका गंदा पानी जमीन में रिसकर स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

लोगों को नहीं मिल रही सही जानकारी
विशेषज्ञों के अनुसार, पानी की गुणवत्ता की रिपोर्ट उपभोक्ताओं को बिल के साथ देना अनिवार्य है, लेकिन यह नियम जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो रहा। इससे लोग यह जाने बिना पानी पी रहे है कि वह सुरक्षित है या नहीं। भूजल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पानी में क्लोराइड और नाइट्रेट का बढ़ता स्तर गंभीर खतरे की ओर इशारा कर रहा है। तय सीमा से ज्यादा क्लोराइड स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इंदौर का जल संकट अब केवल सप्लाई की समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट बन चुका है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह हो सकती है।






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