भाई रत एक कृषि प्रधान देश हैं, यहाँ कृषि से जुड़े परम्परागत पर्व और उत्सव देश के सभी राज्यों में अपने-अपने तौर-तरीकों, परम्पराओं के साथ मनाए जाते हैं। यह कृषि पर्व प्रकृति के प्रति आस्था को प्रकट करने धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करने का वार्षिक फसल उत्सव है। पश्चिम निमाड़ के आदिवासी बाहुल्य जिले बड़वानी के सीमावर्ती शहर सेंधवा का निवासी होने के कारण आदिवासी लोक परम्पराओं को निकटता से समझने का अवसर मिलता रहता हैं। यहां निमाड़ में आदिवासी समुदाय फलिया या मजरा टोला में रहते हैं। एक फलिया में 150 से 200 मकान रहते है। गाँव फलिया से मिलकर ही बना होता है। अक्सर एक फलिया में एक ही कुटुंब के लोग रहते है। यह समुदाय अपने गाँव या फलिया का कृषि पर्व सांस्कृतिक उत्साह, उमंग एवं उल्लास से मानते है। जब खाने योग्य फसल आ जाती है, गाँव में पटेल, पुजारा, वारती सामूहिक रूप से चर्चाकर उत्सव बनाए जाने का का निर्णय लेते हैं, गांव में डोंडी पिटवाकर सूचना दी जाती है। जिसे निमाड़ क्षेत्र में नवाई या नवह कहते हैं। इस प्रकृक्ति उत्सव, धरती माता को धन्यवाद देने के सामूहिक पर्व को ओड़िसा एवं छत्तीसगढ़ नुआखाई कहा जाता है। जो नये धान के स्वागत के लिए मनाया जाता हैं। देश के अन्य प्रांतों में नवाई या नुआखाई को फसल चक्र के अनुसार विविध तौर तरीकों से मनाए जाने की यह लीक परम्परा आदिवासी समाज कान में सदियों से प्रचलित है।
आदिवासी समाज का प्रकृति से निकट का जुड़ाव रहता है। इस समाज की अधिकांश आबादी प्रकृति की गोद में बसती है। जल, जंगल, पहाड़ जैसे प्राकृतिक वातावरण के मध्य अपना जीवन यापन करती है। यह प्रकृति पुत्र धरती माता के प्रति आभार या प्रकृति के प्रति गहरी आस्था रखते है। अपने लोक उत्सवों में यह प्रकृक्ति की वंदना, पूजा, अराधना कर धरती माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते है। नवाई का त्यौहार भी खेतों में लहलहाती पहली फसल का स्वागत करने, प्रकृति की कृपा का आभार प्रदर्शन का सामूहिक उत्सव है।

राज्य कर सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी आदिवासी सामजिक कार्यकर्ता पोरलाल खरतें ने आदिवासी सांस्कृतिक त्यौहार नवाई के संबंध में अपने विचारों से अवगत कराते हुए बताया की दुनियाँ में जहाँ-जहाँ आदिवासी समाज निवास करता है। इस त्यौहार को किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। देश के अधिकांश राज्यों में इसे मूंग, उड़द, मक्के की फसल खेतों में कटाई करने से पहले नई फसल को खाने की शुरुआत करने से पहले नवाखाई, नवाई त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में खरीब या बरसात की फसल जैसे मुंग, चवले, भादी काकड़ी, काचरा और भुट्टे खेतों में पककर तैयार हो जाती है। इस फसल को पकाकार खाने से पहले नवाई त्यौहार मनाते है। यह उत्सव हर गाँव में अलग अलग दिन मनाया जाता है। जिसका कारण हर गाँव में बुआई का समय अलग अलग होता है। नवाई की तारीख का निर्धारण गाँव पटेल, गाँव डाहला, वारती, फूटवाल, पुजारा चौकीदार, फलिया के वरिष्ठजन बैठकर सर्वानुमति से करते है। इस निर्णय को सभी स्वीकारते है। आदिवासी समाज में सामूहिक निर्णय की भावना को तहरीज दी जाती है। गाँव में किसी परिवार में मृत्यु होने की दशा में पूरा गांव नवाई के त्यौहार की टाल देता है। इसे कुछ दिनों बाद सामूहिक रूप से मनाया जाता है। गाँव में नवाई की तारीख तय होने के बाद घरों को गोबर से लिपाई की जाती है पर के चूल्हे से लेकर मुख्य द्वार तक लिपाई की जाती है। गायना होता है जिसमे ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण जीवन प्रणाली के हित में गीत गाए जाते है। जीवन उत्पत्ति की अवधारनाएं । परिकल्पनाएं से लेकर वर्तमान समय तक का मौखिक वाचन किया जाता है। जो गाता है डाक के साथ उसे गायन कहते है। गायना में पूरी रात गाँव के वरिष्ठ लोगों द्वारा जिन्हे गीत की कड़ी की पूरी जानकारी होती है वो डाकं बजाकर गीत गाते है। इस त्यौहार में घर के वरिष्ठ सदस्य पुरखो की आत्माओं का सम्मान करते हुए नई फसल को नहीं खाते। त्यौहार के दिन घर के मुखिया वत रखते हैं। पूजा सामग्री में चावल, मुंग या चवले की दाल, पानी पलाश के पत्ते, महूए की दारू, उवकी, सूपड़ा आदि का इस्तमाल किया जाता है। सागोन की लकड़ी की बनी बनी घिचरी कुल देवी की पूजा की जाती है। रानी काजल माता, राजू पान्तु, भीलट सहित प्रकृति की पूजा की जाती है। यह दाहिने हाथ से दाहिनी तरफ तीन बार और बाए हाथ से दो बार बार्थी तरफ पानी तरफते है। पलाश के पत्तों पर नये पकवान को रखा जाता है। फिर महूर की दारू की बुँदे जमीन गिराई जाती है। इस दौरान चाँद, सूरज, धरती, अनाज और पुरखो की आत्माओं को याद करते हुए धीरे-धीरे महुआ दारु की बुँदे धरती पर गिराई जाती है। इस दिन पूजा के लिए बना पकवान फलिया के सभी घरों में बच्चो को बाट दिया जाता है।





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