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शुक्र है! चुनावी मौसम के चलते नहीं पड़ा कीमतों का भार जनता पर

सरकार ने आज सुबह पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई

इंदौर दैनिक इंदौर संकेत भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जहां हर वर्ष चुनाव होते हैं। बार-बार होने वाले चुनावों को लेकर अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों पर बडा चिंतन-मनन किया जाता है, लेकिन वर्तमान युद्ध की विभीषिका के बीच जिस तरह से पेट्रोल-डीजल और गैस की आपूर्ति और कीमतों को लेकर पूरा विश्व चिंता में है, बात केवल इनकी कीमत को लेकर नहीं हो रही है, बात हो रही है इनकी उपलब्धता को लेकर। इन सबके बीच भारत में लोकतांत्रिक उत्सव का माहौल पांच राज्यों में जारी है। ऐसे में सरकार के लिए पेट्रोल-डीजल, गैस की उपलब्धता पर और बढ़ती कीमतों पर जो अतिरिक्त व्यय हो रहा है, उसका भार चुनावी मौसम के चलते सरकार खुद ही झेल रही है। यह वही पेट्रोल-डीजल है, जो आम दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार का हवाला देकर महंगा होता रहता है। लेकिन चुनाव आते ही वही बाजार जैसे शांत हो जाता है, और सरकार को जनता की जेब का दर्द भी साफ-साफ दिखाई देने लगता है। सवाल यह नहीं कि राहत क्यों दी गई सवाल यह है कि यह राहत हमेशा क्यों नहीं दिखती ?

सरकार ने इस बार अपने ‘मुनाफे’ में कटौती कर जनता को राहत दी है। सुनने में यह त्याग जैसा लगता है, लेकिन राजनीति के जानकार इसे निवेश मानते हैं-सीधा-सीधा वोट में रिटर्न पाने वाला निवेश। दिलचस्प बात यह है कि जनता को राहत देने का यह फार्मूला केवल चुनावी कैलेंडर से ही एक्टिव होता है। बाकी समय महंगाई ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ की तरह निभाई जाती है, जिसमें आम आदमी चुपचाप सहयोग करता रहता है। आर्थिक मोर्चे पर इसे राजस्व घाटा कहा जाएगा, लेकिन राजनीतिक भाषा में यह ‘डैमेज कंट्रोल’ है। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह जनता के साथ खड़ी है, कम से कम तब तक, जब तक जनता वोटिंग मशीन के सामने खड़ी है। अंततः सच्चाई यही है कि इस देश में पेट्रोल-डीजल के दाम सिर्फ तेल के कुओं से तय नहीं होते, बल्कि चुनावी माहौल की गर्मी ठंडक से भी तय होते हैं। केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर आम जनता को राहत देने का फैसला किया है-अब इसे संयोग कहें या चुनावी मौसम का असर, यह समझना मुश्किल नहीं। बीते कुछ महीनों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपना खेल दिखा रही थीं, लेकिन देश में कीमतें बढ़ाने के बजाय सरकार ने अपने हिस्से का ‘त्याग’ दिखाते हुए एक्साइज ड्यूटी कम कर दी। यानी इस बार बोझ जनता पर नहीं, सीधे सरकारी खजाने पर डाला गया-कम से कम फिलहाल के लिए। व्यंग्य यही है कि जनता को राहत तब मिलती है जब वोट की आहट तेज हो जाती है। आम दिनों में जहां पेट्रोल पंप पर खड़े होकर लोग कीमतों पर चर्चा करते नजर आते हैं, वहीं चुनावी दिनों में वही लोग थोड़ी राहत की सांस लेते दिखते हैं।

राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी तैर रहा है, क्या महंगाई का इलाज केवल चुनावी मौसम में ही मिलता है? अगर हां, तो देश में हर साल चुनाव होने चाहिए ताकि जनता को समय-समय पर राहत मिलती रहे। आर्थिक विशेषज्ञ भले ही इसे ‘राजस्व में कमी’ और ‘नीतिगत संतुलन’ का नाम दें, लेकिन आम आदमी इसे सीधे-सीधे अपनी जेब से जोड़कर देख रहा है। उसके लिए यह राहत उतनी ही वास्तविक है, जितनी यह सच्चाई कि चुनाव खत्म होते ही कीमतों का ग्राफ फिर से ऊपर चढ़ सकता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी केंद्र सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत है। इसमें कटौती का मतलब है कि सरकार को प्रत्यक्ष रूप से कम आय होगी। हालांकि, इससे बाजार में उपभोक्ता खर्च बढ़ने की संभावना रहती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था को गति दे सकता है। अंततः यह स्पष्ट है कि पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है-जिसमें सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह जनता के हितों को प्राथमिकता देने के लिए अपने राजस्व में भी कटौती करने को तैयार है।

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