इंदौर • दैनिक इंदौर संकेत
इंदौर शहर आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखकर चिंता होती है। कभी-कभी लगता है कि शहर अब जमीन पर कम और रील में ज्यादा चल रहा है। कैमरे के सामने सब कुछ चमकता हुआ नजर आता है उपलब्धियां हैं, सम्मान हैं, बड़े-बड़े दावे हैं, तस्वीरें हैं और उनका प्रचार है। लेकिन कैमरा बंद होते ही शहर की दूसरी तस्वीर सामने आती है। सड़कों पर धूल और गड्ढे हैं, जगह-जगह जाम है, बारिश में रास्तों की हालत बिगड़ रही है, जलभराव और अव्यवस्थाएं हैं और सबसे बड़ी चिंता यह है कि जरूरत पड़ने पर नागरिकों को संभालने वाली व्यवस्था कितनी तैयार है, इसका भरोसा धीरे-धीरे कमजोर होता दिखाई दे रहा है।
एयर क्वालिटी इन्डेक्स को लेकर सम्मान मिला। उसका खूब प्रचार हुआ, तस्वीरें सामने आईं, बधाइयां दी गईं। सम्मान मिलना निश्चित रूप से अच्छी बात है। लेकिन जब शहर के लोग ही यह सवाल पूछने लगें कि जमीन पर हालात ऐसे हैं तो यह सम्मान आखिर किस तस्वीर का है, तो उस सवाल को भी सुनना होगा।
शहर को प्रचार नहीं, काम चाहिए
इंदौर को अब AC कमरों से नहीं, सड़कों पर उतरकर संभालने की जरूरत है। शहर को प्रचार नहीं, काम चाहिए। दावे नहीं, जवाब चाहिए। और सबसे ज्यादा जरूरत उस भरोसे की है कि मुश्किल वक्त में व्यवस्था नागरिकों के साथ खड़ी होगी लेकिन इस कड़वी बात में स्वयं को शामिल किए बिना बात पूरी नहीं होगी। सच यह है कि हम सभी कहीं न कहीं जनता के दर्द, उसकी परेशानियों और वास्तविक हालातों से दूर होते जा रहे हैं। न सार्वजनिक सरोकार वाली पत्रकारिता का वह साहस उतना दिखाई देता है, जो व्यवस्था से असहज सवाल पूछ सके ; न जवाबदारी निभाने का वह नैतिक साहस और दूरदर्शिता दिखाई देती है, जो समय रहते समस्याओं को समझकर समाधान तलाश सके।
…तो देश के बाकी शहरों की हवा और हालात क्या होंगे :
कई लोग तो यह तक कह रहे थे कि अगर ऐसी स्थिति में भी इंदौर देश में दूसरा स्थान हासिल कर रहा है, तो देश के बाकी शहरों की हवा और हालात क्या होंगे। लेकिन बात सिर्फ हवा की नहीं है। बात पूरे शहर की है। समस्या यह है कि कहीं हम समस्याओं को हल करने से ज्यादा उनकी अच्छी तस्वीर दिखाने को लेकर चिंतित तो नहीं हो गए हैं? अधिकारी हों या नेता, अगर उपलब्धि का मतलब सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट, रील और फोटो बनकर रह जाए तो यह शहर के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
शायद यही सबसे गंभीर चिंता है
आज हालात आक्रोश के चरम पर पहुंचने से पहले के अंतिम पड़ाव जैसे दिखाई दे रहे हैं। भोपाल में महापौर के वाहन में आग लगाने जैसी घटना को भी केवल एक अलग-थलग घटना मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। ऐसी घटनाएं समाज के भीतर बढ़ती बेचैनी और व्यवस्था के प्रति घटते भरोसे की गंभीर चेतावनी हो सकती हैं। जनता के आक्रोश को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर दबाया नहीं जा सकता। उसके पीछे छिपे सवालों को भी समझना होगा। लोग क्या कह रहे हैं? किस बात से नाराज हैं? किस व्यवस्था से उनका भरोसा उठ रहा है? और क्या हम उनकी बात सुनने के लिए समय रहते तैयार हैं? यह किसी व्यक्ति, अधिकारी या राजनीतिक दल के खिलाफ आरोप-पत्र नहीं है। यह हम सभी के लिए आत्मावलोकन का समय है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता का धैर्य असीमित नहीं होता और व्यवस्था पर भरोसा भी अपने आप कायम नहीं रहता। उसे काम से अर्जित करना पड़ता है।





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