इंदौर। राजनीति में युवाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, लेकिन बदलते दौर के साथ युवा राजनीति की तस्वीर भी बदल रही है। अब राजनीतिक दलों की नजर नई पीढ़ी यानी Gen Z पर है। कांग्रेस जहां सोशल मीडिया पर सक्रिय, नए विचारों वाली और पहली बार मतदान करने वाली युवा पीढ़ी को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं भारतीय जनता युवा मोर्चा में कई पुराने और उम्रदराज चेहरों के लंबे समय से पदों पर बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी का प्रयास नई पीढ़ी की सोच, रोजगार, शिक्षा, तकनीक और सामाजिक मुद्दों से जुड़े युवाओं तक पहुंच बनाने का है। कांग्रेस मानती है कि आने वाले चुनावों में Gen Z मतदाता बड़ी राजनीतिक ताकत साबित हो सकते हैं।
दूसरी ओर इंदौर में भारतीय जनता युवा मोर्चा की राजनीति में उम्र सीमा और पदाधिकारियों के लंबे कार्यकाल को लेकर अंदरखाने चर्चाएं तेज हैं। संगठन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि युवा मोर्चा में नए चेहरों को आगे आने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि कई पुराने नेता वर्षों से संगठनात्मक पदों पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।
नए चेहरों को मौका देने की मांग
भाजयुमो के भीतर यह सवाल उठाया जा रहा है कि जिस संगठन का मूल उद्देश्य युवाओं को राजनीति और नेतृत्व के लिए तैयार करना है, वहां लंबे समय से पदों पर जमे नेताओं की जगह नई पीढ़ी को कब अवसर मिलेगा?
कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रभावशाली नेताओं और वरिष्ठ आकाओं के संरक्षण के कारण कई चेहरे संगठन में लगातार बने हुए हैं। ऐसे में युवा कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व विकसित होने की गति प्रभावित हो रही है।
उम्र सीमा को लेकर भी बहस
इंदौर भाजयुमो में कई पदाधिकारियों और दावेदारों की उम्र को लेकर भी चर्चाएं सामने आ रही हैं। संगठन के अंदर यह बहस तेज है कि युवा मोर्चा में जिम्मेदारी संभालने वालों के लिए निर्धारित आयु संबंधी मानकों का प्रभावी ढंग से पालन होना चाहिए।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि युवा संगठन में ही नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी तो नए कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ सकती है। इसका सीधा फायदा दूसरे राजनीतिक दलों को मिल सकता है, जो नई पीढ़ी को सक्रिय रूप से अपने साथ जोड़ने में जुटे हैं।
पद छोड़ने को तैयार नहीं पुराने चेहरे?
संगठन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कई ऐसे नेता हैं, जो वर्षों से युवा राजनीति में सक्रिय रहते हुए संगठनात्मक पदों पर बने रहना चाहते हैं। आलोचकों का कहना है कि पद के साथ राजनीतिक पहचान और प्रभाव जुड़ा होने के कारण कुछ नेता अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं होते।
यही वजह है कि नए कार्यकर्ताओं को नेतृत्व की मुख्यधारा में आने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई स्थानों पर युवा कार्यकर्ताओं के दूसरे संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर रुख करने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।
पीरू ठाकुर और मयूर पिंगले के नामों को लेकर चर्चाएं
भाजयुमो की नई संगठनात्मक नियुक्तियों और नगर नेतृत्व को लेकर कई नाम चर्चा में हैं। पीरू ठाकुर सहित कुछ नेताओं की उम्र और संगठनात्मक भूमिका को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठाए जाने की बात सामने आई है।
इसी तरह नगर अध्यक्ष पद की दावेदारी से जुड़े मयूर पिंगले के नाम को लेकर भी विभिन्न प्रकार की शिकायतों और विवादों की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में हैं। हालांकि इन मामलों में लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
‘युवा’ संगठन में अधेड़ चेहरों पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज की राजनीति में केवल पारंपरिक कार्यशैली से युवाओं को लंबे समय तक नहीं जोड़ा जा सकता। Gen Z सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नए राजनीतिक विमर्श के जरिए अपनी राय बना रही है।
ऐसे में कांग्रेस जहां सीधे नई पीढ़ी तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजयुमो के सामने चुनौती यह है कि वह पुराने अनुभव और नए नेतृत्व के बीच संतुलन कैसे बनाए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या युवा मोर्चा वास्तव में नए युवाओं को नेतृत्व सौंपने के लिए तैयार है या फिर संगठन की कमान लंबे समय से राजनीति कर रहे पुराने चेहरों के हाथों में ही बनी रहेगी?
आने वाले दिनों में भाजयुमो की नई नियुक्तियां इस सवाल का जवाब दे सकती हैं। फिलहाल इंदौर की युवा राजनीति में एक बात साफ दिखाई दे रही है—कांग्रेस की नजर ‘Gen Z’ पर है, जबकि भाजयुमो में ‘युवा’ नेतृत्व की उम्र और अवसर को लेकर बहस तेज हो चुकी है।
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