राहुल गांधी से बातचीत के बाद बैकफुट पर आई सरकार
नई दिल्ली (एजेंसी)। संसद के मानसून सत्र में मंगलवार रात हुई गतिरोध खत्म करने के लिए सरकार ने विपक्ष की ओर बातचीत का हाथ बढ़ाया है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए बिल) के कुछ प्रावधानों में नरमी बरतने को तैयार है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि नए नियमों का पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) नहीं होगा, जिससे पहले से जुड़े मामलों या विदेशी निवेश पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
इसी क्रम में संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने बुधवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से अहम मुलाकात की। करीब 50 मिनट चली इस बैठक में एफसीआरए संशोधन विधेयक, परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक और संसद में लंबित अन्य विधायी कार्यों पर विस्तार से चर्चा हुई। सरकार का उद्देश्य मानसून सत्र को 13 अगस्त तक सुचारु रूप से चलाना है और एफसीआरए विधेयक कब पेश होगा, यह विपक्ष के सहयोग और चर्चा की सहमति पर निर्भर करेगा।
राहुल गांधी और किरेन रिजिजू के बीच 50 मिनट की मुलाकात
संसदीय कार्य सुचारु रूप से चलाने के प्रयास के तहत किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से संसद भवन में मुलाकात की। बैठक के दौरान सरकार ने विपक्ष से लंबित विधेयकों पर सहयोग का आग्रह किया। रिजिजू ने बताया कि सरकार चाहती है कि सभी दलों की सहमति से महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा हो और विपक्ष की आपत्तियों का समाधान निकालकर सदन का कामकाज आगे बढ़ाया जाए।

एफसीआरए बिल को लेकर क्या है विवाद?
एफसीआरए संशोधन विधेयक को लेकर सिविल सोसायटी, ईसाई संगठनों और कई सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं ने चिंता जताई है। विवाद का मुख्य कारण धारा 14(बी) में प्रस्तावित “समाप्ति (Termination)” की नई व्यवस्था है। आलोचकों का कहना है कि जिन संस्थाओं का विदेशी फंड लेने का पंजीकरण समाप्त होगा, उनकी संपत्तियों—जैसे स्कूल, अस्पताल और अन्य परिसंपत्तियों—पर सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक का नियंत्रण हो सकता है।
सरकार की सफाई
सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि विधेयक का उद्देश्य किसी संस्था की संपत्ति पर स्थायी कब्जा करना नहीं है। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त होता है तो केवल अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था लागू होगी, ताकि संस्था का कामकाज प्रभावित न हो। मूल मालिक या संस्था के प्रतिनिधि वापस आने पर संपत्ति और प्रबंधन उन्हें सौंप दिया जाएगा। धार्मिक संस्थाओं का संचालन भी उनके धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुरूप ही जारी रहेगा।






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