इंदौर शहर में जेईई मेंस के नतीजे आते ही कोचिंग संस्थानों की होर्डिंग्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स से एक ही आंकड़ा चमकता है-99। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखी यह संख्या ऐसे पेश की जाती है मानो छात्र ने 300 में से 99 अंक हासिल कर लिए हों। हकीकत में यह परसेंटाइल है, अंक नहीं। लेकिन प्रचार की भाषा और प्रस्तुति ऐसी कि अभिभावक और छात्र भ्रमित हो जाएं।

क्या है असल सच्चाई?
JEE-main में परिणाम परसेंटाइल के रूप में घोषित होते हैं, जो सापेक्ष (रिलेटिव) प्रदर्शन दशति हैं। 99 परसेंटाइल का अर्थ है- आप 99% छात्रों से बेहतर हैं। यह 99 अंक नहीं है। परसेंटाइल नॉर्मलाइजेशन के बाद तय होता है, जो अलग-अलग शिफ्ट की कठिनाई के अनुसार बदलता है। इसके बावजूद कई संस्थान पोस्टर पर ’99’ को इस अंदात में उछालते हैं कि साधारण अभिभावक अंक और परसेंटाइल का फर्क ही न समझ पाए।
कैसे बनता है दबाव ?
95-98 परसेंटाइल जैसे उत्कृष्ट परिणाम भी ‘कम’ लगने लगते हैं। छात्र खुद को असफल मानने लगते हैं। अभिभावक अवास्तविक अपेक्षाएं पाल लेते हैं। कमजोर छात्र हतोत्साहित होकर पढ़ाई से दूरी बनाने लगते हैं। शहर के एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘पोस्टर देखकर लगा कि बच्चे को 99 नंबर मिले हैं। बाद में पता चला यह परसेंटाइल है। इतनी बड़ी उपलब्धि है,फिर भी उसे ऐसे बेचा जा रहा है जैसे चमत्कार हो।’

विज्ञापन या भ्रामक प्रस्तुति ?
शहर में रिजल्ट सीजन आते ही चौराहों पर सैकड़ों होर्डिंग्स, अखबारों में फुल पेज विज्ञापन, सोशल मीडिया पर ‘टॉपर फैक्ट्री’ के दावे किए जाते हैं, जिनमें कई जगह छोटे अक्षरों में प्रसेंट लिखा होता है, जबकि बड़ा फोकस केवल ’99’ पर रहता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह पारदर्शिता है या मार्केटिंग की चाल?
क्या कहते हैं जानकार
शिक्षाविदों का मानना है कि परसेंटाइल और अंक के अंतर को स्पष्ट करना जरूरी है। सफलता का पैमाना केवल 99 नहीं हो सकता। हर छात्र की क्षमता अलग होती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ‘अत्यधिक तुलना और अवास्तविक लक्ष्य छात्रों में चिंता और अवसाद बढ़ा सकते हैं।’
असली मुद्दा : शिक्षा या ब्रांडिंग?
कोचिंग संस्थान टॉपर की तस्वीर के साथ अपना नाम चमकाते हैं, लेकिन कुल कितने छात्रों में से टॉपर निकला? कितनों का औसत परिणाम रहा? कितनों ने बीच में पढ़ाई छोड़ी? इन सवालों पर अक्सर चुप्पी रहती है।





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