इंदौर का राजबाड़ा केवल एक बाजार नहीं, शहर की पहचान है। यहां रविवार को भीड़ होना कोई नई बात नहीं। महिलाएं खरीदारी करने आएंगी, परिवार आएंगे, बच्चे आएंगे और बाजार गुलजार रहेगा—यही तो किसी जीवंत बाजार की पहचान है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बाजार में भीड़ बढ़ जाने से फुटपाथ पर कब्जा करने की अनुमति मिल जाती है?
रविवार को राजबाड़ा में अतिक्रमण और यातायात अव्यवस्था को लेकर सामने आया तर्क इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि समस्या का कारण अतिक्रमणकारी नहीं, खरीदारी करने आई भीड़ को बताया जा रहा है। यदि वास्तव में भीड़ बढ़ने का कारण महिलाओं की खरीदारी है, तो फिर सवाल उठता है कि नगर निगम का रिमूवल अमला आखिर किसके लिए तैनात है?
फुटपाथ जनता का है या दुकानदार का?
फुटपाथ इसलिए बनाए जाते हैं कि पैदल चलने वालों को सुरक्षित रास्ता मिल सके। लेकिन राजबाड़ा में स्थिति कई बार उलट दिखाई देती है। सड़क किनारे हाथ ठेले, अस्थायी दुकानें और सामान फुटपाथ पर फैल जाता है और पैदल चलने वाला व्यक्ति सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है। यह केवल अतिक्रमण नहीं, पैदल नागरिक के अधिकार पर कब्जा है और जब इस स्थिति पर सवाल उठता है तो जवाब मिलता है- ‘रविवार को बहुत भीड़ थी।’ भीड़ तो बाजार में हमेशा रहेगी। सवाल यह है कि भीड़ को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
‘भीड़ बहुत थी’ जवाब नहीं हो सकता-
यदि किसी सड़क पर ट्रैफिक जाम हो जाए तो क्या यह कहा जा सकता है कि वाहन बहुत ज्यादा थे, इसलिए जाम हो गया? यदि अस्पताल में मरीज ज्यादा हों तो क्या अस्पताल प्रबंधन कह सकता है कि मरीज कम हो जाएं तो व्यवस्था ठीक हो जाएगी? ठीक यही तर्क राजबाड़ा में भी लागू होता है। जनता का बाजार में आना समस्या नहीं है, जनता के लिए रास्ता उपलब्ध नहीं होना समस्या है। रविवार की भीड़ बाजार की लोकप्रियता का प्रमाण है, प्रशासनिक विफलता का बहाना नहीं।






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