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कृषि सहकारी संस्था की जमीन पर बड़ा खेल

अवैध हुई ‘लक्ष्य विहार’, फिर भी बड़े-बड़े होर्डिंग की बहार

इंदौर। राऊ तहसील के ग्राम रंगवासा में पट्टे की कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनी लक्ष्य विहार विकसित करने का मामला प्रशासनिक लापरवाही की बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि जिस कॉलोनी को अपर कलेक्टर न्यायालय ने करीब एक वर्ष पहले ही अवैध घोषित कर दिया था, वहां सड़कें, बाउंड्रीवाल और अन्य निर्माण धड़ल्ले से होते रहे। कॉलोनाइजरों ने बड़े-बड़े झंडे लगाकर खुलेआम ब्रांडिंग की, लेकिन जिम्मेदार अमला तमाशबीन बना रहा।

मामला ग्राम रंगवासा के सर्वे नंबर 1/2/7, 4/12, 4/31, 4/49, 4/16, 4/35, 4/23 और 4/53 का है। राऊ एसडीओ की वर्ष 2025 की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि बोंदर, रामा, सोरमबाई, सुगनबाई, रामीबाई, विकास, विद्या, भारती, फूलीबाई, नगजीराम तथा विकास, सभी निवासी ग्राम रंगवासा, बिना सक्षम अनुमति के कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनी लक्ष्य विहार विकसित कर छोटे-छोटे प्लॉट बेच रहे हैं।


कृषि के लिए मिली जमीन, फिर कैसे बदल गए मालिक

जांच में सामने आया कि सर्वे नंबर 1 और 4 की भूमि वर्ष 1959-60 से 1978 तक शासकीय रिकॉर्ड में दर्ज थी। बाद में यह भूमि श्री गणेश सामूहिक कृषि सहकारी संस्था के नाम दर्ज हुई। यह जमीन कृषि प्रयोजन और सदस्यों के जीवन-यापन के लिए आवंटित की गई थी। वर्ष 2003 में संस्था के स्थान पर 18 सदस्यों के नाम दर्ज हो गए, लेकिन यह आज तक स्पष्ट नहीं हो सका कि किस वैधानिक आदेश के तहत ऐसा हुआ।

कई अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया कि संस्था के वास्तविक पंजीकृत सदस्यों और उसके मूल उद्देश्य तक की जानकारी उपलब्ध नहीं है। वर्ष 2023 में कलेक्टर से भूमि बिक्री की अनुमति मांगी गई थी, जिसे निरस्त कर दिया गया था।


कलेक्टर गौरव बेनल ने कॉलोनी को अवैध घोषित करते हुए तहसीलदार राऊ को संबंधित खसरों में अवैध कॉलोनी प्रकरण लंबित दर्ज करने और नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद निर्माण नहीं रुका।

स्वामित्व विवाद कोर्ट में, फिर भी जमीन पर चलता रहा खेल

भूमि के स्वामित्व का विवाद फिलहाल उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इसी कारण अधिकारी खुलकर बोलने से बच रहे हैं। अफसरों का कहना है कि वे कोर्ट में प्रशासन का पक्ष मजबूती से रखने की तैयारी में जुटे हुए हैं।

इधर, तहसीलदार सत्येंद्र सिंह का कहना है कि कोर्ट में मामला विचाराधीन है। दो बार कोर्ट कॉस्ट भी लग चुका है। प्रशासन अपना पक्ष मजबूती से रख रहा है।

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