मुरली की धुन पर झूम सारा संसार, वही है हमारा पालनहार- यह पावन पवित्र सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण की महिमा, उनकी बांसुरी की जादुई धुन और संपूर्ण सृष्टि के रक्षक (पालनहार) के रूप में उनके स्वरूप को दर्शाती है।
बांसुरी की धुन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब द्वापर युग में कान्हा अपनी मुरली बजाते थे, तो न केवल गोप-गोपियां बल्कि पशु-पक्षी, नदियां और संपूर्ण ब्रह्मांड उनकी धुन पर मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगता था।
पालनहार
गीता के उपदेशों और पुराणों के अनुसार, श्री कृष्ण ही संपूर्ण सृष्टि के नियंता और संकटों से उबारने वाले पालनहार हैं। भारतीय जीवन-दर्शन में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण केवल आस्था के दो महान केंद्र नहीं हैं, बल्कि जीवन जीने की दो अलग-अलग, किंतु परस्पर पूरक दृष्टियां भी हैं। राम मर्यादा, आदर्श और अनुशासन के प्रतीक हैं, जबकि कृष्ण जीवन की सहजता, व्यवहारिकता, प्रेम, नीति और समय के अनुरूप निर्णय लेने की कला सिखाते हैं। शायद इसी भाव को सहज शब्दों में कहा गया है- ‘राम सपने हैं और कृष्ण अपने हैं।’
राम वह आदर्श हैं, जैसा जीवन हम जीना चाहते हैं। कृष्ण वह अनुभव हैं, जिसके सहारे हम जीवन की जटिल परिस्थितियों से गुजरते हैं। मनुष्य बचपन में आदर्शों के साथ जीवन की यात्रा शुरू करता है। वह सत्य, न्याय और मर्यादा के सीधे रास्ते पर चलना चाहता है, लेकिन समय उसे जीवन के अनेक रंगों से परिचित कराता है। परिस्थितियां बदलती हैं, चुनौतियां सामने आती हैं और तब केवल आदर्श ही नहीं, विवेक और व्यवहार-कुशलता की भी आवश्यकता पड़ती है।
यही कारण है कि कहा गया है- ‘मनुष्य की यात्रा राम से शुरू होती है और समय उसे कृष्ण बना देता है।’ इसका अर्थ आदर्शों को छोड़ देना नहीं, बल्कि उन्हें बचाए रखने के लिए जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को समझना है। राम मर्यादा का मार्ग दिखाते हैं तो कृष्ण उस मर्यादा और धर्म की रक्षा के लिए समयानुकूल निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करते हैं। राम अनुकरणीय हैं और कृष्ण चिंतनीय; दोनों ही भारतीय जीवन-दृष्टि के ऐसे आधार हैं, जिनसे मनुष्य को अलग-अलग परिस्थितियों में प्रेरणा मिलती है।
कृष्ण की सहजता ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति
• भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही सहज भी है। वे बालक हैं तो माखन चुराने वाले कान्हा हैं, मित्र हैं तो सुदामा के सखा हैं, प्रेम के प्रतीक हैं तो राधा के कृष्ण हैं, राजनीति में हैं तो कुशल रणनीतिकार हैं और युद्धभूमि में हैं तो अर्जुन के सारथी।
• यही बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें जन-जन के निकट ले आता है। कृष्ण केवल मंदिरों में स्थापित देवता नहीं लगते, बल्कि जीवन के हर मोड़ पर साथ खड़े दिखाई देते हैं। वे यह संदेश देते हैं कि आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से दूर भागना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहकर भी अपने विवेक और मूल्यों को जीवित रखना है।
• आज का मनुष्य भी लगभग इसी संघर्ष से गुजर रहा है। परिवार, समाज, प्रतिस्पर्धा, राजनीति, नौकरी और व्यवसाय- हर क्षेत्र में परिस्थितियां जटिल होती जा रही हैं। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का जीवन केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन का मार्गदर्शन भी बन जाता है।
कृष्ण की कारागार में जन्म की उमंग का प्रकाश
• भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रसंग भी आशा और परिवर्तन का अद्भुत प्रतीक है। जिस कारागार में भय, अत्याचार और निराशा का वातावरण था, वहीं कृष्ण का जन्म हुआ। देवकी और वसुदेव के बंधन खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए।
• यह प्रसंग केवल एक पौराणिक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि जीवन के एक गहरे संदेश के रूप में भी समझा जा सकता है। जब जीवन में आशा का जन्म होता है तो सबसे मजबूत दिखाई देने वाले बंधन भी कमजोर पड़ने लगते हैं। जब चेतना जागती है तो भय की दीवारें टूटने लगती हैं।
• कृष्ण का जन्म हमें यह विश्वास देता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, परिवर्तन की शुरुआत वहीं से हो सकती है, जहां उसकी संभावना सबसे कम दिखाई देती है।
आज के युग में क्यों जरूरी हैं कृष्ण?
• आज का समय केवल आदर्शवाद का नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण व्यवहार का भी है। हर बात पर टकराव, हर परिस्थिति में क्रोध और हर समस्या का सीधा समाधान संभव नहीं होता। कई बार धैर्य, कई बार संवाद, कई बार रणनीति और कई बार समय की प्रतीक्षा ही सही रास्ता बनती है।
• श्रीकृष्ण का जीवन यही सिखाता है कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए केवल शक्ति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बुद्धि, नीति और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता भी आवश्यक है।
• कृष्ण हमें परिस्थितियों के सामने झुकना नहीं सिखाते, बल्कि परिस्थितियों को समझकर उनका सामना करना सिखाते हैं। वे जीवन में संतुलन की शिक्षा देते हैं- प्रेम भी, कर्तव्य भी; मित्रता भी, नीति भी; करुणा भी और आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष भी।
• शायद यही श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है। राम हमें वैसा बनने की प्रेरणा देते हैं जैसा होना चाहिए और कृष्ण हमें यह समझाते हैं कि जैसा जीवन सामने है, उसमें धर्म और विवेक के साथ कैसे जिया जाए।





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