इंदौर के विकास, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और विभागीय समन्वय को लेकर उठे सवाल, कांग्रेस ने साधा निशाना
इंदौर। मध्य प्रदेश की राजनीति में बुधवार को उस समय हलचल तेज हो गई जब नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखे गए एक कथित पत्र की चर्चा सामने आई। पत्र के सार्वजनिक होने की खबरों के बाद सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। हालांकि इस कथित पत्र की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं जारी हैं।
सूत्रों के मुताबिक, 20 जून दिनांकित बताए जा रहे इस कथित पत्र में इंदौर से जुड़े विकास कार्यों, नगरीय विकास विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक समन्वय पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पत्र में मास्टर प्लान के क्रियान्वयन में हो रही देरी, इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन से जुड़े विषयों और विभिन्न विकास परियोजनाओं के लंबित रहने पर चिंता जताई गई है। बताया जा रहा है कि पत्र में मंत्री की ओर से यह उल्लेख किया गया है कि पिछले करीब ढाई वर्षों से उन्हें विभागीय स्तर पर अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। कथित तौर पर पत्र में यह भी कहा गया है कि कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय और तबादले मंत्री की जानकारी अथवा सहमति के बिना किए जा रहे हैं, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है।
सूत्रों के अनुसार, पत्र में यह भी चिंता व्यक्त की गई है कि इंदौर जैसे प्रदेश के प्रमुख शहर से जुड़े विकास कार्यों को अपेक्षित गति नहीं मिल पा रही है। यदि यही स्थिति बनी रही तो शहर के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कथित पत्र के अंत में यह भी उल्लेख होने की चर्चा है कि यदि समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो वे जनता के बीच जाकर अपनी बात रखने के लिए विवश होंगे। इस पूरे घटनाक्रम पर जब मीडिया ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कथित पत्र की जानकारी होने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे किसी पत्र की जानकारी नहीं है और इसकी वास्तविकता के बारे में संबंधित माध्यमों से ही पूछा जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद पत्र की प्रामाणिकता को लेकर और भी सवाल खड़े हो गए हैं।

उधर, कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर भाजपा सरकार पर हमला बोल दिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि यह पत्र वास्तविक है तो यह भाजपा सरकार के भीतर समन्वय की कमी और आंतरिक मतभेदों का प्रमाण है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया कि सरकार के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कथित पत्र की पुष्टि होती है तो यह केवल एक प्रशासनिक असहमति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर समन्वय और निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल खड़े करेगा। वहीं यदि पत्र फर्जी साबित होता है तो इसके पीछे की मंशा और इसे सार्वजनिक करने वालों की भूमिका भी जांच का विषय बन सकती है।
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कथित पत्र की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में राजनीतिक बयानबाजी के बीच सभी की नजरें सरकार और संबंधित पक्षों की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं।





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