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दोहरी उलझन नगर निगम में फंस गया

एक लाख से कम के चेक पर रोक का फैसला बन गया गले की फांस

इंदौर। एक लाख से कम राशि के चेक लेने से इनकार के फैसले ने नगर निगम की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। चेक बाउंस के मामलों में वसूली और धारा 138 की कानूनी कार्रवाई पर होने वाले खर्च से बचने के लिए लिया गया यह निर्णय अब खुद निगम के लिए सवाल खड़े कर रहा है। नागरिकों के विरोध के बाद मामला नियम और व्यावहारिक व्यवस्था के बीच उलझता नजर आ रहा है।

पूर्व पार्षद ने उठाई आपत्ति- मामलों में पूर्व पार्षद और कांग्रेस नेता दिलीप कोशल ने आपत्ति लेते हुए निगम सभापति मुन्नालाल यादव को पत्र लिखा और स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा। इधर पत्र मिलते ही सभापति यादव ने निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल को पत्र लिखकर पूछा है कि चेक पर अस्वीकृत करने जैसा निर्णय किस आधार पर लिया गया।

चेक बाउंस से बढ़ा निगम का खर्च

निगम स्तर पर निर्णय लिया गया था कि लगातार बाउंस हो रहे छोटे मूल्य के चेक के कारण उनकी वसूली के लिए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत कार्रवाई में लगने वाले खर्च को देखते हुए एक लाख से कम के चेक स्वीकार नहीं किए जाएंगे। निगम का तर्क था कि कम राशि के चेक के लिए कानूनी प्रक्रिया में होने वाला खर्च कई बार वसूल की जाने वाली रकम के मुकाबले अनुपातहीन हो जाता है। बीते सालों में ऐसा ही हुआ। राजस्व विभाग को सम्पत्तिकर, जलकर और कचरा शुल्क के लिए मिले चेक बाउंस हो गए। इनकी वसूली के लिए मुकदमा दायर हो तो पता चला कि जितनी राशि वसूलनी थी उससे कई अधिक राशि वकील फीस और कोर्ट में पेशी पर होने वाला खर्च अधिक हो रहा है।

700 चेक बाउंस, करीब 50 लाख की राशि- राजस्व अपर आयुक्त

आकाश सिंह ने बताया बीते वित्त वर्ष में बाउंस की संख्या 700 करीब थी। कुल राशि लगभग 50 लाख रुपए लेकिन ये सभी चेक 25 से 50 हजार के अंदर थे, नगर निगम ने जब चेक बाउंस होने पर सभी केस दायर के खर्च का आकलन किया तो यह घाटा बहुत अधिक हो रहा था। इस दौरान यह भी जानकारी सामने आई कि 5 हजार चेक बाउंस हुआ और वसूली के लिए होने वाला खर्च 30 हजार है। छोटे मूल्य के चेक के कारण उनकी वसूली के लिए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत कार्रवाई में लगने वाले खर्च को देखते हुए एक लाख से कम के चेक स्वीकार नहीं किए जाएंगे। निगम का तर्क था कि कम राशि के चेक के लिए कानूनी प्रक्रिया में होने वाला खर्च कई बार वसूल की जाने वाली रकम के मुकाबले अनुपातहीन हो जाता है।

झोन 8 के एआरओ से अभिभाषक की बहस

बीते शुक्रवार को नगर निगम के विजय नगर झोन 8 पर सहायक राजस्व अधिकारी और एक अभिभाषक की बहस हो गई। एआरओ ने जब 1 लाख रुपए से कम की राशि का चेक लेने से इनकार किया तो अभिभाषक ने पूछा कि ऐसा कौन से नियम में लिखा है कि चेक से भुगतान नहीं होगा। मुझे बताइए, नहीं तो मेरा चेक स्वीकार कीजिए। निगम अधिकारियों और अभिभाषक के बीच देर तक बहस चलती रही। इस दौरान अधिकारियों ने अपनी समस्या बताई, तब कहीं जाकर अभिभाषक ने अधिकारियों की बात मान ली। शुल्क के लिए मिले चेक बाउंस हो गए। इनकी वसूली के लिए मुकदमा दायर हो तो पता चला कि जितनी राशि वसूलनी थी उससे कई अधिक राशि वकील फीस और कोर्ट में पेशी पर होने वाला खर्च अधिक हो रहा है।

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