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बीजेपी में अब ‘समर्पण’ नहीं, ‘सरेंडर’ का इनाम

छह दिन के नए नेता पर मेहरबानी, वर्षों से झंडा ढोने वाले कार्यकर्ता पूछ रहे– हमारी तपस्या किस काम की?

इंदौर। इंदौर बीजेपी में इन दिनों एक सवाल तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या पार्टी में अब वर्षों की निष्ठा से ज्यादा दूसरे दलों से आने वालों को मिल रहा सम्मान? इसी सवाल की वजह बने हैं कांग्रेस छोड़कर 9 जुलाई को बीजेपी में शामिल हुए राकेश यादव। महज छह दिन में पहले उन्हें प्रदेश प्रवक्ता की जिम्मेदारी मिली और फिर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के इंदौर दौरे के दौरान एयरपोर्ट पर जिस तरह उन्हें अगली कतार में जगह दी गई, उससे संगठन के भीतर नई बहस छिड़ गई है।

बीजेपी के कई पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक बूथ से लेकर मंडल, जिला और प्रदेश स्तर तक पार्टी के लिए काम किया, दिन-रात मेहनत की, विपक्ष के हमले सहे, लेकिन उन्हें आज तक ऐसी राजनीतिक पहचान नहीं मिली, जैसी एक नए चेहरे को कुछ ही दिनों में मिल गई।

संगठन की लगाम ढीली या वीआईपी ट्रीटमेंट

कांग्रेस से बीजेपी में आए राकेश यादव को लेकर पार्टी के अंदर एक नई बहस छिड़ गई है। चर्चा इस बात की नहीं कि वे कांग्रेस पर लगातार हमलावर हैं, बल्कि इस बात की है कि कई पुराने नेताओं को दरकिनार कर उन्हें बिना ग्रुप कॉन्फ्रेंस किए प्रेस ब्रीफिंग जारी कर देने से बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में औपचारिक रूप से प्रदेश स्तर के प्रवक्ताओं और नेताओं के बयान तथा रणनीति और समन्वय के तहत जारी होने की परंपरा प्रभावित होती दिख रही है। बड़े राजनीतिक मुद्दों पर कांग्रेस से पहले प्रदेश मीडिया विभाग और संगठन को सूचना देना सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि राकेश यादव इस परंपरा से अलग अपनी शैली में काम कर रहे हैं। यही वजह है कि संगठन के भीतर सवाल उठने लगे हैं कि क्या उन्हें विशेष छूट मिली हुई है, या फिर उनकी सक्रियता पर कोई निगरानी नहीं है? सूत्रों के मुताबिक, कुछ नेताओं का मानना है कि यदि हर प्रवक्ता अपनी-अपनी लाइन पर चलेगा तो पार्टी का आधिकारिक संदेश कमजोर पड़ सकता है।

आगे निकल गए?

पार्टी के अंदर चर्चा है कि जिन नेताओं ने कांग्रेस में रहते हुए वर्षों तक बीजेपी और उसके शीर्ष नेतृत्व पर हमले किए, वही नेता आज बीजेपी में आते ही संगठन के फ्रंट फेस बनने नजर आ रहे हैं। इससे उन कार्यकर्ताओं में असहजता है, जिन्होंने राजनीतिक संघर्ष करते हुए यात्रा बीजेपी के साथ तय की। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम लड़ते रहे, वे आते ही आगे निकल गए।”

पुराने चेहरे क्यों हैं खामोश?

बीजेपी में हाल ही में प्रदेश प्रवक्ताओं की नई टीम बनाई गई। संगठन के कई नेताओं को वर्षों की मेहनत के बाद जिम्मेदारी मिली। वहीं राकेश यादव को पार्टी में प्रवेश के साथ ही प्रवक्ता बनाया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री के साथ उनकी प्रमुख मौजूदगी ने यह संदेश भी दिया कि संगठन उन्हें तेजी से आगे बढ़ाना चाहता है। यही कारण है कि कांग्रेस से वर्षों पहले बीजेपी में आए कई नेता भी इस घटनाक्रम को चुपचाप देख रहे हैं। वे खुलकर कुछ नहीं कह रहे, लेकिन अंदरखाने असंतोष की चर्चा तेज है।

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