बीमा और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ीं, फिर भी इंदौर जिले के 78.8 फीसदी बच्चे एनीमिक; स्टंटिंग और कम वजन में सुधार, लेकिन वेस्टिंग बढ़ी
इंदौर। इंदौर जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं, स्वच्छता और संस्थागत प्रसव से जुड़े आंकड़ों में सुधार हुआ है, लेकिन बच्चों की पोषण स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के आंकड़ों के मुताबिक जिले में 6 से 59 माह की उम्र के 78.8 फीसदी बच्चे एनीमिया से प्रभावित हैं। पिछली रिपोर्ट में यह आंकड़ा 71.2 फीसदी था। यानी स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ने के बावजूद बच्चों में खून की कमी की समस्या में सुधार नहीं हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक जिले में स्वास्थ्य बीमा या वित्तीय सहायता योजना का कवरेज 15.7 फीसदी से बढ़कर 40.3 फीसदी हो गया है। बेहतर स्वच्छता सुविधा वाले परिवारों का प्रतिशत भी 75.2 फीसदी से बढ़कर 90 फीसदी पहुंच गया है। कुल लिंगानुपात 895 से बढ़कर 987 और जन्म के समय लिंगानुपात 849 से बढ़कर 996 हुआ है।
स्टंटिंग और कम वजन में सुधार
बच्चों की पोषण स्थिति के कुछ संकेतकों में सुधार भी सामने आया है। उम्र के हिसाब से कम लंबाई यानी स्टंटिंग का प्रतिशत 39.2 फीसदी से घटकर 28.7 फीसदी हो गया है। इसी तरह कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत भी 30.6 फीसदी से घटकर 24.9 फीसदी हुआ है। हालांकि, वेस्टिंग यानी लंबाई के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत बढ़ गया है। यह आंकड़ा पिछली रिपोर्ट में 17.8 फीसदी था, जो अब बढ़कर 21.2 फीसदी हो गया है। इससे बच्चों के पोषण स्तर को लेकर नई चिंता सामने आई है।
6 से 23 माह के सिर्फ 9.8 फीसदी बच्चों को पर्याप्त आहार
रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू बच्चों के खानपान से जुड़ा है। इंदौर में 6 से 23 माह की उम्र के केवल 9.8 फीसदी बच्चों को पर्याप्त आहार मिल रहा है। NFHS-4 में यह आंकड़ा 10.3 फीसदी था। इससे साफ है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के बावजूद छोटे बच्चों को उम्र के अनुरूप पर्याप्त और संतुलित आहार उपलब्ध कराने की चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों के विकास के शुरुआती वर्षों में पर्याप्त पोषण बेहद महत्वपूर्ण होता है।
प्रसव के बाद देखभाल में बड़ा सुधार
इंदौर में प्रसव के बाद माताओं को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं के आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। प्रसव के दो दिन के भीतर पोस्टनेटल केयर पाने वाली माताओं का प्रतिशत 67.4 फीसदी से बढ़कर 92.6 फीसदी हो गया है। इसी तरह संस्थागत प्रसव का प्रतिशत भी 94.7 फीसदी से बढ़कर 96.5 फीसदी हुआ है। यह स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों तक पहुंच में सुधार का संकेत है।
बच्चों में एनीमिया सबसे बड़ी चिंता
NFHS-6 के आंकड़ों में बच्चों का एनीमिया सबसे गंभीर संकेतक बनकर सामने आया है। 6 से 59 माह के बच्चों में एनीमिया 71.2 फीसदी से बढ़कर 78.8 फीसदी हो गया है। महिलाओं में भी एनीमिया का प्रतिशत बढ़ा है। महिलाओं में यह आंकड़ा 46.8 फीसदी से बढ़कर 48.1 फीसदी हुआ है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के साथ बच्चों और महिलाओं के भोजन में आयरन तथा अन्य जरूरी पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है।
मध्यप्रदेश में भी पोषण की चुनौती
मध्यप्रदेश के आंकड़े भी बच्चों की पोषण स्थिति को लेकर चिंता बढ़ाते हैं। प्रदेश में स्टंटिंग का प्रतिशत 35.7 फीसदी से घटकर 31.4 फीसदी हुआ है, लेकिन वेस्टिंग 18.9 फीसदी से बढ़कर 23.8 फीसदी और कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 33 फीसदी से बढ़कर 39.7 फीसदी हो गया है। छह माह तक केवल स्तनपान कराने की दर भी 74 फीसदी से घटकर 56.4 फीसदी रह गई है। वहीं 6 से 23 माह की उम्र के केवल 12 फीसदी बच्चों को पर्याप्त आहार मिल रहा है।
सुविधाएं बढ़ीं, अब पोषण पर फोकस की जरूरत
NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि इंदौर में स्वच्छता, संस्थागत प्रसव, प्रसव के बाद देखभाल और स्वास्थ्य बीमा जैसे क्षेत्रों में सुधार हुआ है। लेकिन बच्चों में एनीमिया और वेस्टिंग के बढ़ते आंकड़े यह संकेत देते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पोषण और खानपान पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों को पर्याप्त और संतुलित आहार, आयरन एवं जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य और महिला-बाल विकास विभाग के स्तर पर लगातार प्रयासों की आवश्यकता है।





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