इंदौर। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की नजर आज भी भोपाल पर टिकी हुई है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की कमान अचानक मोहन यादव को सौंप दी गई। शिवराज भले ही दिल्ली चले गए, लेकिन उनका मन आज भी मध्य प्रदेश की राजनीति में बसा है।
सोशल मीडिया पर मामा के दर्जनों पेज आज भी बहुत तेजी से प्रमोट किए जा रहे हैं। इन डिजिटल पेजों के जरिए प्रदेश की जनता के बीच मामा की मौजूदगी लगातार बनी हुई है। हर छोटे-बड़े मुद्दे पर शिवराज का बयान तुरंत आता है और सोशल मीडिया पर छा जाता है। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि शिवराज अपनी बनाई-बनाई जमीन को किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं।
सोशल मीडिया का ये खेल आखिर क्या इशारा कर रहा है?
शिवराज के आधिकारिक हैंडल्स के अलावा कई अनौपचारिक पेज भी राज्य में दिन-रात एक्टिव चल रहे हैं। इन सभी पेजों पर एक ही समय में शिवराज के भाषण और दौरे प्रमोट किए जा रहे हैं। यह महज समर्थकों का प्यार है या फिर एमपी में एक्टिव ब्रांड बने रहने की सोची-समझी रणनीति? अगर पेड प्रमोशन के जरिए कंटेंट फैलाया जा रहा है, तो इसके सियासी मायने जरूर निकाले जाएंगे।
मूंग खरीदी का विवाद : क्या अपने ही बयान में घिरी सरकार?
हाल ही में मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसानों ने एक बड़ा आंदोलन छेड़ दिया था। तब केंद्रीय मंत्री शिवराज ने कहा कि केंद्र सरकार सिर्फ एक सीमित मात्रा में ही मूंग खरीदेगी। बाकी बची हुई फसल को खरीदने की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार यानी मोहन सरकार को उठानी होगी। शिवराज के इस बयान से गेंद सीधे मुख्यमंत्री मोहन यादव के पाले में जाकर अचानक गिर पड़ी। किसान को सिर्फ अपनी फसल बेचने से मतलब है, भुगतान कौन सरकार करती है, इससे फर्क नहीं पड़ता। शिवराज के इस तकनीकी जवाब ने मोहन सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनाकर खड़ा कर दिया।
पीएम मोदी से हुई शिकायत ने बढ़ा दी मोहन यादव की चिंता?
सूत्रों के मुताबिक शिवराज ने पीएम मोदी से राज्य के कृषि कार्यक्रमों की शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि केंद्रीय कृषि मंत्री होने के बाद भी उन्हें राज्य में तवज्जो नहीं मिल रही। इस शिकायत के बाद से ही बीजेपी के भीतर दो पावर सेंटर बनने की खबरें काफी तेज हो गईं।
मध्य प्रदेश में दो पावर सेंटर! मोहन यादव के सामने असली चुनौती
फिलहाल शिवराज सिंह चौहान और मोहन यादव के बीच कोई खुला टकराव सामने नजर नहीं आ रहा। पर मोहन यादव के पास सरकार की ताकत है और शिवराज के पास जनता का जबरदस्त प्यार। जब भी किसान नाराज होते हैं, लोग यही पूछते हैं कि शिवराज सीएम होते तो क्या करते? लाड़ली बहना योजना का जिक्र आते ही जनता की जुबान पर आज भी मामा का नाम आ जाता है। मोहन यादव के सामने असली चुनौती शिवराज के इस विशाल सियासी साये से खुद को बाहर निकालने की है।
क्या शिवराज फिर से लौटेंगे मध्य प्रदेश की सत्ता की ओर?
शिवराज के पास आज 1.40 लाख करोड़ रुपये के विशाल बजट वाला केंद्रीय कृषि जैसा बड़ा मंत्रालय है। राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद और दायरा अब पहले से काफी ज्यादा बड़ा और मजबूत हो चुका है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि वह वापस मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल होना चाहते हैं। लेकिन वह मध्य प्रदेश की अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन को भी खाली बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे।
मुख्यमंत्री मोहन यादव को अपनी एक नई और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की बेहद सख्त जरूरत है। अगर हर बड़े किसान मंच पर शिवराज छाए रहेंगे, तो मोहन यादव का सियासी स्पेस खत्म हो जाएगा।




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