शिक्षक संगठनों ने किया विरोध, पदोन्नत होने वाले शिक्षक असमंजस में
इंदौर | स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 853 व्याख्याताओं को प्राचार्य पद पर पदोन्नति देने की तैयारी के बीच विभाग ने एक नया कदम उठाया है। अधिकारियों ने पदस्थापना (पोस्टिंग) से पहले शिक्षकों से 15 दिन के भीतर सहमति या असहमति पत्र मांगा है। इस निर्णय से पदोन्नत होने वाले शिक्षक असमंजस में हैं और शिक्षक संगठनों ने भी इसका विरोध जताया है।
जानकारों के अनुसार सामान्य प्रक्रिया में पहले पदोन्नति आदेश जारी होता है, उसके बाद संबंधित शिक्षक की पदस्थापना की जाती है। यदि किसी शिक्षक को व्यक्तिगत या वैधानिक कारणों से समस्या हो तो वह उस स्तर पर अपना पक्ष रख सकता है। लेकिन इस बार पोस्टिंग से पहले ही सहमति-असहमति मांगने की प्रक्रिया अपनाई गई है, जिसे प्रशासनिक व्यवस्था के विपरीत माना जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अभी तक किसी शिक्षक को यह जानकारी नहीं है कि उसकी पदस्थापना किस जिले या किस विद्यालय में होगी, तब वह किस आधार पर सहमति या असहमति देगा? यदि किसी शिक्षक के सामने पारिवारिक, स्वास्थ्य या अन्य प्रशासनिक परिस्थितियां हों, तो निर्णय लेना और अधिक कठिन हो जाता है।
सूत्रों के अनुसार शिक्षा विभाग की ओर से जारी सूची में शिक्षकों को पदस्थापना का स्थान बताए बिना ही पहले अपनी सहमति देने को कहा गया है। इसके बाद यदि कोई शिक्षक पदभार ग्रहण नहीं करता, तब असहमति की प्रक्रिया अपनाने की बात कही गई है। डीपीआई के इस निर्णय ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विभाग जल्दबाजी में प्रक्रिया पूरी करना चाहता है और भविष्य में होने वाली प्रशासनिक जटिलताओं की जिम्मेदारी कम करना चाहता है।
क्या कहते हैं अधिकारी…
- अनीता मोहन, संयुक्त संचालक, लोक शिक्षण इंदौर संभाग
“प्रमोशन की प्रक्रिया जारी है। जैसे निर्देश केंद्र द्वारा मिलेंगे, उनका पालन किया जाएगा।” - योगेश मल्लो, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला इंदौर
“हाई स्कूल कैडर राज्य स्तरीय है। इसलिए पूरे प्रदेश से संबंधित निर्णय लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा लिए जाते हैं।”

संगठनों ने जताई आपत्ति…
- आलोक परमार, कार्यकारी अध्यक्ष, मध्यप्रदेश शिक्षक कांग्रेस
“यदि नियमों की बात की जाए तो पहले शिक्षकों को उनकी पदस्थापना संस्था की जानकारी दी जानी चाहिए। उसके बाद ही सहमति या असहमति लेना उचित होगा।” - के.के. आर्य, प्रदेश अध्यक्ष, अजय अध्यापक शिक्षक संघ, मध्यप्रदेश
“बिना काउंसलिंग के पोस्टिंग देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।”
क्या कहते हैं शिक्षाविद…
- नीरज लाल खुशाल, पूर्व डीईओ, जिला देवास
“पहले पदोन्नति के साथ ही नए पद पर स्थापना होती थी। यदि किसी शिक्षक को असुविधा होती तो वह पदस्थापना के बाद असहमति व्यक्त करता था।” - रमेश बाहेती, शिक्षाविद
“स्कूली शिक्षा विभाग में पहले भी पदोन्नतियां हुई हैं, लेकिन पोस्टिंग से पहले सहमति लेने की व्यवस्था नहीं थी। यह प्रक्रिया शिक्षकों में भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।”
पदोन्नति की खुशी हुई काफूर
विभाग द्वारा पदोन्नति की तैयारी के बावजूद शिक्षकों में उत्साह कम दिखाई दे रहा है। पदस्थापना का स्थान स्पष्ट नहीं होने और पहले से सहमति मांगने की प्रक्रिया के कारण कई शिक्षक असमंजस में हैं।
सवाल जो उठ रहे हैं…
- पोस्टिंग से पहले सहमति या असहमति किस आधार पर?
- बिना पदस्थापना के अधिकारी निर्णय कैसे लें?
- क्या डीपीआई ने स्थापित प्रशासनिक प्रक्रिया को बदल दिया?
- क्या इससे आगे पोस्टिंग प्रक्रिया में नए विवाद खड़े हो सकते हैं?





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