इंदौर। इंदौर नगर निगम में 89 सफाई मित्र (हरिजन बेलदार) से 30 साल तक सेवाएं ली गईं। जब ये रिटायर हुए और पेंशन मांगी तो निगम को याद आया कि इनकी भर्ती में घोटाला हुआ था। पेंशन देने से मना कर दिया गया। इंदौर नगर निगम में 89 सफाई मित्रों की पेंशन और ग्रेच्युटी से जुड़ी एक फाइल करीब एक साल से चल रही है। इन सफाई मित्रों की भर्ती अगस्त 1997 में हुई थी और वे साल 2025 तक नगर निगम में काम करते रहे।
रिटायरमेंट के बाद जब उन्होंने पेंशन और ग्रेच्युटी की मांग की तो मामला अधिकारियों के पास पहुंचा। इसके बाद पुरानी भर्ती की फाइल निकाली गई। जांच में अधिकारियों ने दावा किया कि इनकी भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई थी और इसे अवैध बताया गया। इसके बाद इन कर्मचारियों की पेंशन रोक दी गई। अब यह मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है, जहां इस पर सुनवाई हो रही है।
लोकायुक्त में हुई शिकायत, इन पार्षदों, अधिकारियों के नाम
इस भर्ती को लेकर कमल सावधानी नाम के व्यक्ति ने लोकायुक्त में शिकायत की। शिकायत में तत्कालीन पार्षद छोटू शुक्ला, रामलाल यादव और अनिल शुक्ला की चयन समिति पर आरोप लगाए गए। इसके अलावा तत्कालीन निगम उपायुक्त विजय शंकर उपाध्याय, चीफ हेल्थ ऑफिसर अरविंद पुराणिक और निगम सचिव बंशीलाल जोशी का नाम भी सामने आया। आरोप है कि ये सभी लोग चयन समिति और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े हुए थे।
कब, कैसे हुई भर्ती
नगर निगम के हेल्थ विभाग के जोन-18 में हरिजन बेलदार की सीधी भर्ती के लिए अगस्त 1994 में विज्ञापन जारी किया गया था। इसमें 77 पदों पर भर्ती निकाली गई थी। लेकिन बाद में चयन समिति ने इंटरव्यू के जरिए 77 की जगह 89 लोगों को भर्ती दे दी। इन सभी को अगस्त 1997 में नियुक्ति मिली। कर्मचारियों को फिक्स पे पर रखा गया और इन्हें सफाई मित्र का नाम दिया गया।
हाईकोर्ट ने पार्षदों को बरी किया
इस मामले में साल 2015 में तत्कालीन पार्षदों और चयन समिति के सदस्य छोटू शुक्ला, रामलाल यादव और अनिल शुक्ला को बरी किया गया था।
नियुक्ति में यह घोटाला लोकायुक्त ने पाया
नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी को लेकर लोकायुक्त ने इन सभी को आरोपी बनाया है। साल 2007 में भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया गया था और 2009 में कोर्ट में चालान पेश किया गया था। जांच में सामने आया कि 77 पदों के लिए निकली भर्ती में 89 लोगों को नियुक्ति दे दी गई। इनमें 23 उम्मीदवार तय समय के दायरे में नहीं थे। वहीं 39 उम्मीदवारों के पास न्यूनतम पांचवीं पास की योग्यता भी नहीं थी। इसके अलावा 63 लोगों का रोजगार कार्यालय में पंजीयन नहीं मिला। जांच एजेंसी ने माना कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई और इसमें गड़बड़ी की गई।
शुक्ला ने लोकायुक्त की कार्रवाई पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता और अन्य नियमों की जांच करना निगम अधिकारियों और चयन समिति की जिम्मेदारी थी। उनका काम सिर्फ इंटरव्यू लेना था।





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