भोपाल। भाजपा में श्यामाप्रसाद मुखर्जी जयंती पर अभियान तेज है, लेकिन संगठनात्मक नियुक्तियां अब भी लंबित हैं। कार्यकर्ताओं में नाराजगी है और चुनाव से पहले फैसलों में हो रही देरी पर सवाल उठ रहे हैं। एमपी भाजपा एक बार फिर बड़े वैचारिक और राजनीतिक अभियानों की तैयारी में जुट गई है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती वर्ष पर 23 जून से 6 जुलाई तक प्रदेशभर में कार्यक्रमों की लंबी श्रृंखला शुरू होने जा रही है। सवाल यह है कि क्या भाजपा संगठन का पूरा ध्यान सिर्फ आयोजनों तक सीमित होकर रह गया है, जबकि कई महत्वपूर्ण संगठनात्मक फैसले महीनों से लंबित पड़े हैं?
बड़े-बड़े आयोजन, लेकिन संगठन में बढ़ती बेचैनी
भाजपा लगातार नए कार्यक्रमों और अभियानों का ऐलान कर रही है। बूथ स्तर से लेकर जिला और प्रदेश स्तर तक गतिविधियों का कैलेंडर तैयार हो रहा है। इसके बावजूद जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी और निराशा दिखाई दे रही है। कारण यह है कि संगठन से जुड़े कई अहम निर्णय अब तक फाइलों से बाहर नहीं निकल पाए हैं। मंडल और निगम-मंडलों में नियुक्तियों का इंतजार लंबा होता जा रहा है, जबकि प्रदेश कार्यसमिति के विस्तार को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कार्यकर्ताओं का सवाल: मेहनत करने वालों की बारी कब?
संगठन के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता अब भी इंतजार कर रहे हैं। दूसरी तरफ प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से मजबूत नेताओं को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां और पद मिलते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में जमीनी स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर संगठन उन कार्यकर्ताओं को कब याद करेगा, जिन्होंने चुनावों और आंदोलनों में पार्टी के लिए लगातार काम किया।
क्या दिग्गजों की खींचतान बन रही देरी की वजह?
भाजपा के अंदरूनी गलियारों में चर्चा है कि कई नियुक्तियां और संगठनात्मक फैसले वरिष्ठ नेताओं के बीच सहमति नहीं बनने के कारण अटके हुए हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं है, लेकिन लंबे समय से लंबित फैसले कई तरह के सवाल जरूर खड़े कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सब कुछ सामान्य होता तो संगठनात्मक नियुक्तियां इतनी देर तक लंबित नहीं रहतीं।
चुनाव करीब, लेकिन संगठनात्मक तस्वीर धुंधली
प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में अब लगभग दो साल का समय बचा है। ऐसे समय में आमतौर पर राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने और जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा करने पर जोर देते हैं।

इंदौर-भोपाल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष-उपाध्यक्षों के नाम अब तक उलझे
मध्यप्रदेश में जहां अधिकांश आयोग, निगम और प्राधिकरणों में अध्यक्ष-उपाध्यक्षों की नियुक्तियां हो चुकी हैं, वहीं इंदौर और भोपाल विकास प्राधिकरण के अध्यक्षों के नाम अब तक फाइनल नहीं हो पाए हैं। राजधानी के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर इस संबंध में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बीच हुई चर्चा में नए सिरे से नामों पर विचार किया गया है। बताया जा रहा है कि पहले भी कुछ नाम लगभग तय हो चुके थे और आदेश जारी होने वाले थे, लेकिन पार्टी के भीतर विरोध के चलते प्रक्रिया रोक दी गई।
परिणाम यह हुआ कि जिन नामों पर सहमति बनती दिख रही थी, वे फाइलों में ही अटक गए। अब एक बार फिर संभावना जताई जा रही है कि अगले कुछ दिनों में इन नामों पर मुहर लग सकती है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पहले चर्चा में रहे नामों को ही अंतिम रूप दिया जाएगा या नए नाम सामने आएंगे।






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