कभी देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर अब एक नई पहचान की ओर बढ़ रहा है— देश का सबसे धैर्यवान शहर। कारण साफ है, यहां की जनता रोजाना घंटों ट्रैफिक जाम में फंसकर धैर्य की परीक्षा जो दे रही है।
इन दिनों इंदौर शहर में ऐसा कोई प्रमुख मार्ग नहीं बचा, जहां शाम के समय वाहनों की लंबी कतारें न दिखाई देती हों। दोपहिया और चारपहिया वाहनों की संख्या हर दिन बढ़ रही है। सड़कें वही हैं, लेकिन आबादी लगातार बढ़ रही है। कोई रोजगार के लिए आया है, कोई शिक्षा के लिए, तो कोई व्यापार की संभावनाओं के कारण इंदौर को अपना स्थायी ठिकाना बना चुका है। नतीजा यह है कि शाम ढलते ही शहर की रफ्तार भी थम जाती है। विजय नगर, पलासिया, भंवरकुआं, राऊ, लसूड़िया और एबी रोड जैसे प्रमुख मार्गों पर वाहन रेंगते नजर आते हैं। एबी रोड की कहानी तो और भी दिलचस्प है। एक ओर एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण शहर के भविष्य को बेहतर बनाने का सपना दिखा रहा है, तो दूसरी ओर वर्तमान में लगे बैरिकेड्स और पत्थरों ने सड़क को इतना संकरा कर दिया है कि वाहन चालक रोजाना ‘धीमी गति प्रतियोगिता’ में हिस्सा लेते दिखाई देते हैं।
शहर के नागरिक अब अपने घर से निकलने से पहले यह नहीं पूछते कि ‘कितनी दूरी है?’ बल्कि यह सोचते हैं कि ‘जाम कितना मिलेगा?’ पांच किलोमीटर का सफर आधे घंटे में पूरा हो जाए तो लोग इसे अपनी किस्मत का साथ मान लेते हैं।
सोशल मीडिया पर भी लोग मजाक में कहने लगे हैं कि इंदौर में गाड़ी खरीदने के साथ एक फोल्डिंग कुर्सी और थर्मस भी मिलना चाहिए, ताकि जाम में आराम से समय काटा जा सके। स्थानीय चर्चाओं में भी अव्यवस्थित निर्माण कार्यों और ट्रैफिक प्रबंधन को लेकर चिंता जताई जा रही है। बेशक, विकास कार्य जरूरी हैं। एलिवेटेड कॉरिडोर, मेट्रो और फ्लाईओवर भविष्य में राहत दे सकते हैं, लेकिन फिलहाल इंदौरवासियों की हालत उस मरीज जैसी है, जिसे डॉक्टर कह रहा है— ‘इलाज तो चल रहा है, बस थोड़ी तकलीफ और सह लीजिए।’
अब सवाल यह है कि शहर की बढ़ती आबादी, वाहनों की बाढ़ और अधूरी यातायात व्यवस्थाओं के बीच इंदौर अपनी रफ्तार कैसे बनाए रखेगा? क्योंकि यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में इंदौर का नया पर्यटन नारा कुछ ऐसा हो सकता है— ‘इंदौर आइए, सराफा और छप्पन दुकान के स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद बाद में लीजिए, पहले ट्रैफिक जाम का आनंद लीजिए।’






Total Users : 23489
Leave a comment