पार्षद दल की राय को नहीं दिया गया महत्व
इंदौर। नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष पद पर सोनिला मिमरोट की नियुक्ति के बाद कांग्रेस में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। नियुक्ति के दूसरे ही दिन पार्टी के भीतर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। शहर कांग्रेस के प्राथमिक सचिव राजेश मेवाड़ा ने इस्तीफा दे दिया है, जबकि विधानसभा-1 क्षेत्र के कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफों की चेतावनी दी है।
राजेश मेवाड़ा ने अपने इस्तीफे में आरोप लगाया है कि संगठन ने लगातार वरिष्ठ और सक्रिय पार्षदों की उपेक्षा की है। उनका कहना है कि इस फैसले से जमीन स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भावनाएं आहत हुई हैं और संगठन में निराशा का माहौल है। नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में वरिष्ठ पार्षद फौजिया शेख आलम, रबीना इकबाल खान और विनीतिका (दीपू) यादव के नाम प्रमुख दावेदारों के रूप में चर्चा में थे। संगठन और निगम के कई नेताओं का मानना था कि अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर इन्हीं में से किसी एक को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, लेकिन प्रदेश संगठन ने पहली बार पार्षद बनी सोनिला मिमरोट के नाम पर मुहर लगा दी।

अनुभवी पार्षदों को दरकिनार करना उचित नहीं
नियुक्ति के बाद बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और पदाधिकारी वरिष्ठ पार्षद विनीतिका (दीपू) यादव के निवास पहुंचे। यहां कार्यकर्ताओं ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यदि संगठन इसी तरह मनमाने निर्णय लेता रहा और वरिष्ठ पार्षद व जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी होती रही तो वे सामूहिक इस्तीफा देने को मजबूर होंगे।
कार्यकर्ताओं का कहना था कि निगम में वर्षों से पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे अनुभवी पार्षदों को दरकिनार करना उचित नहीं है। विधानसभा-1 क्षेत्र के अंतर्गत ब्लॉक क्रमांक-1 और 3 के 17 वार्ड अध्यक्ष, 17 वार्ड प्रभारी, 17 महिला अध्यक्ष, 5 ब्लॉक अध्यक्ष तथा शहर कांग्रेस के 7 पदाधिकारी सामूहिक इस्तीफे की तैयारी में हैं। यदि जल्द इस मुद्दे पर संवाद नहीं हुआ तो यह विवाद और गहरा सकता है।
नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ यह विवाद कांग्रेस के भीतर चल रही नाराजगी और गुटबाजी को खुलकर सामने ले आया है। अब देखना होगा कि प्रदेश नेतृत्व नाराज कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को कैसे मनाता है।

पार्षद दल की राय को महत्व नहीं दिया गया
कांग्रेस की परंपरा रही है कि नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष का चयन पार्षद दल की बैठक में किया जाता है और निर्वाचित पार्षद अपने नेता का चुनाव करते हैं। लेकिन इस बार प्रदेश नेतृत्व ने सीधे नियुक्ति कर दी, जिससे कई पार्षद और पदाधिकारी खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि पार्षद दल की राय को महत्व नहीं दिया गया और ऊपर से फैसला थोप दिया गया, जिसके कारण संगठन में असंतोष बढ़ा है।






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