मुख्य मार्गों पर काम, कॉलोनियों-मोहल्लों में दो साल से मरम्मत का इंतजार
इंदौर संकेत प्रतिनिधि
इंदौर। शहर की सड़कों को लेकर नगर निगम हर साल करोड़ों रुपए खर्च करता है। नई तकनीक से पेचवर्क करने के दावे किए जाते हैं, सड़कों को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने की बातें होती हैं, लेकिन बारिश की कुछ झड़ियों में ही इन दावों की पोल खुल जाती है।
बारिश से पहले जिन सड़कों पर पेचवर्क कराया गया था, उनमें से कई जगहों पर पेच उखड़ चुके हैं, कहीं गड्ढे फिर दिखाई देने लगे हैं तो कहीं सड़क की जगह मुरम डालकर काम निपटाने की कोशिश नजर आ रही है। हालात यह हैं कि शहर के किसी भी हिस्से में निकल जाएं, सड़कों की खराब स्थिति सामने आ जाती है। मुख्य सड़कों पर निगम ने फिर भी काम कराया है, लेकिन कॉलोनियों और मोहल्लों की सड़कों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। दो साल से मरम्मत का इंतजार कर रही कई अंदरूनी सड़कें अब वाहन चालकों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं। सड़कों की बदहाली केवल पुराने या बाहरी इलाकों तक सीमित नहीं है। शहर के पॉश इलाके, साकेत और बैंकटधाम, मनीषपुरी तक इससे अछूते नहीं हैं। यहां भी कई अंदरूनी सड़कों पर लंबे समय से मरम्मत नहीं हुई है। स्थानीय रहवासियों के सामने सवाल है कि जब शहर के प्रमुख और विकसित इलाकों की सड़कों का यह हाल है तो बाकी कॉलोनियों और मोहल्लों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
गुणवत्ता पर भी बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल सड़क निर्माण और पेचवर्क को लेकर है। यदि नई तकनीक से किया गया पेचवर्क कुछ ही की गुणवत्ता को समय में उखड़ जाता है तो उसकी गुणवत्ता की जांच कौन करेगा? जिस सड़क पर लाखों-करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, वह कुछ समय बाद फिर मरम्मत मांगने लगे तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? निगम को केवल नई सड़क बनाने और गड्ढे भरने के आंकड़े जारी करने के बजाय यह भी बताना होगा कि पिछले वर्षों में पेचवर्क पर कितना पैसा खर्च हुआ, कितनी सड़कों पर काम हुआ, कितने समय तक पेचवर्क टिका और गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई। क्योंकि शहर को हर बारिश के बाद नए पेचवर्क की नहीं, ऐसी सड़कों की जरूरत है जिन पर बार-बार पेच लगाने की जरूरत ही न पड़े।





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