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वर्चस्व का कद, दल बदलने पर नहीं बदला पद

आशीष गुप्ता : 9425064357
इंदौर। दैनिक इंदौर संकेत कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव राकेश यादव आखिरकार भाजपा के हो गए। हाल ही में उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने प्रदेश टिकट, टिकट बेचने जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस को कटघरे में खड़ा किया था। भाजपा में शामिल होते ही उन्हें प्रदेश प्रवक्ता जैसा अहम पद दे दिया गया।

यह है भाजपा की रणनीति। दरअसल कांग्रेस से आए नेताओं के खिलाफ बोलने वाले ऐसे व्यक्ति की भाजपा को जरूरत थी, जो कांग्रेस को भीतर से जानता हो और उस पर तीखे हमले कर सके। जिस तरह से हाल ही में जीतू पटवारी व अन्य कांग्रेस नेता भाजपा और खासकर मुख्यमंत्री को लगातार घेर रहे हैं, ऐसे में भाजपा को पटवारी और कांग्रेस नेतृत्व को घेरने वाले और उन्हें समझने वाले नेता की जरूरत थी। आने वाले समय में यादव के निशाने पर मुख्य रूप से राहुल गांधी, जीतू पटवारी और हरीश चौधरी होंगे।

संगठन में अंदरूनी उठापटक का नतीजा रहा यह दल बदल

सूत्रों के अनुसार राकेश यादव की भाजपा में एंट्री पार्टी संगठन के उच्च स्तर पर चल रही अंदरूनी वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम भी मानी जा रही है। हाल ही में प्रदेश के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि “कौन राकेश यादव? मैं नहीं जानता।” इसके बाद सोशल मीडिया पर मौजूद विधायक रमेश मेंदोला की भी सार्वजनिक तौर पर प्रतिक्रिया चर्चा में रही। भाजपा के विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार तभी से राकेश यादव को लेकर प्रदेश भाजपा में सक्रियता बढ़ गई थी। यादव से पुराने संबंधों के चलते उन्हें भाजपा में लाने की पटकथा तैयार की गई। खुद राकेश यादव ने सार्वजनिक रूप से जीतू पटवारी पर लगातार हमला कर अपना रास्ता साफ कर लिया था।

राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि जिस तरह से कैलाश विजयवर्गीय लगातार प्रदेश के मुखिया की कार्यशैली पर प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेशाध्यक्ष पर हमला कर रहे थे, उससे प्रदेश नेतृत्व नाराज बताया जा रहा था। यही कारण था कि जिस नेता को खुद कैलाश विजयवर्गीय पहचानने से इनकार कर रहे थे, उसे अंदरूनी रणनीति के तहत प्रदेश प्रवक्ता बनाकर संगठन को अलग संदेश दिया गया। अति विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले में प्रदेश के दो महामंत्रियों के साथ दो विधायकों की भी भूमिका बताई जा रही है।

भाजपा में लगातार दूसरे दलों के नेताओं की एंट्री और उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने का सिलसिला अब पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ताओं की तपस्या का मूल्य आखिर क्या रह गया ? हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस से आए नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने के बाद भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं में यह भावना उभर रही है कि पार्टी के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वालों की तुलना में बाहर से आने वालों को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसका मजबूत संगठन और समर्पित कार्यकर्ता माना जाता रहा है। यही कार्यकर्ता बूथ स्तर से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत की नींव रखते हैं। लेकिन जब ऐसे कार्यकर्ता वर्षों तक किसी जिम्मेदारी की प्रतीक्षा करते रहें और दूसरी पार्टियों से आए लोगों को सीधे महत्वपूर्ण पद मिल जाएं, तो स्वाभाविक रूप से मनोबल प्रभावित होता है। पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि शांति केवल जमीन स्तर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर भी पूरी तरह बरकरार नहीं है।

सूत्रों का कहना है कि यह नाराजगी अभी खुलकर सामने नहीं आई है, लेकिन संगठन के भीतर इसकी चर्चा लगातार हो रही है। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो समर्पित कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन संगठन के भीतर उठ रही इन चर्चाओं ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या पार्टी नेतृत्व तक जमीनी कार्यकर्ताओं की भावनाएं सही तरीके से पहुंच पा रही हैं, या फिर संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की दूरी बढ़ रही है।

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