दरअसल कांग्रेस के पूर्व पार्षद दिलीप कौशल की और से दर्ज याचिका में दावा किया गया है कि मतदाता-सूची पुनिरिक्षण कार्यक्रम में भारी अनियमितताएँ की गई हैं। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा SIR कार्रवाई चलाए जाने और विपक्ष द्वारा लगातार “वोट चोरी” के आरोपों के बीच यह मामला और गर्मा गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि पुनिरिक्षण के दौरान मतदाता जोड़ने-घटाने के आवेदनों को सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे नागरिक आपत्ति ही नहीं उठा पाए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इंदौर नगर निगम क्षेत्र में हजारों मतदाताओं का पता “भवन क्रमांक 0” दिखाया गया है, जबकि सुधार की शिकायतें पिछले कई महीनों से लंबित हैं। इतना ही नहीं, लगभग 476 मतदान केंद्र ऐसे बताए गए हैं जहाँ मतदाताओं की संख्या 500 से भी कम है, जबकि निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन 1200 मतदाताओं की है। विधानसभा-5 के वार्ड 50 के मतदान केंद्र क्रमांक 34 में तो सिर्फ 40 वोट दर्ज हैं! इस मामले में याचिका दायर करने वाले अभिभाषक जयेश गुरनानी का तर्क है कि मध्यप्रदेश निर्वाचन नियम 1994 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 आपस में विरोधाभासी हैं, जिसके कारण नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
उच्च न्यायालय ने याचिका के तथ्यों को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों को 26 नवंबर को कटघरे में जवाब देने के आदेश दिए हैं। अब अगले दस दिन पूरे प्रदेश की चुनावी राजनीति को झकझोरने वाले साबित हो सकते हैं।
बाइट – जयेश गुरनानी, हाईकोर्ट एडवोकेट इंदौर




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