इंदौर संकेत प्रतिनिधि
इंदौर। मेगा सीटी परियोजना से इंदौर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इसमें कंपनी के टेंडर घोटाले और नियमों के उल्लंघन का पर्दाफाश किया गया है। इसमें गांधी हॉल का रिनोवेशन भी शामिल है। केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना स्मार्ट सिटी मिशन के तहत इंदौर स्मार्ट सिटी मिशन के टेंडर के नाम पर जमकर खेल हुए हैं। कभी सिंगल बोली देने के बाद ठेका दे दिया गया, तो कभी सही ठेकेदार को दरकिनार कर अपने वाले को दे दिया। कई कामों में नियमों को ताक पर रखकर भुगतान भी किया गया। इंदौर गांधी हॉल का रिनोवेशन भी नियमों के खिलाफ किया गया था।
कैग की रिपोर्ट में एक-एक बातों का खुलासा
कम्प्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की रिपोर्ट में एमपी के सभी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का विश्लेषण किया गया है। इसमें इंदौर के कई प्रोजेक्ट और टेंडर को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। साफ लिखा गया है कि इस सरकारी राशि के नुकसान के लिए अधिकारियों को जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने वित्तीय नियमों का उल्लंघन कर यह काम किए हैं।
इंदौर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में कुल 773 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें केंद्र से 485 करोड़ रुपये और राज्य से 275 करोड़ रुपये मिले थे। बाकी 13 करोड़ अतिरिक्त खर्च हुए हैं।

गांधी हॉल का रिनोवेशन, बसों का साउंडप्रूफिंग गलत
रिपोर्ट में साफ है कि स्मार्ट सिटी द्वारा गांधी हॉल के रिनोवेशन का टेंडर बिना इमरजेंसी, तकनीकी योग्यताओं वाले कामों को नहीं लेना था। इसके तहत गांधी हॉल के रिनोवेशन पर करीब 42 करोड़ 13 लाख से नगर निगम ने स्मार्ट सिटी से काम कराया था। इसके साथ ही निगम ने 16 जगहों पर सिविल वर्क कराकर बसों का साउंडप्रूफिंग भी 10 करोड़ 58 लाख की लागत से किया, जो नियमों के खिलाफ था। इसके अलावा, वॉटर सप्लाई लाइन पर 6 करोड़ 80 लाख और सड़क कंट्रीब्यूशन पर 42 करोड़ 53 लाख रुपये खर्च किए गए थे। इस तरह, इंदौर स्मार्ट सिटी ने कुल 68 करोड़ के काम नियमों के खिलाफ किए हैं।
यहां तो गजब किया ठेकेदार पैसे लेकर चला गया
वहीं एक काम का और जिक्र किया गया है। इंदौर में इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगाने का 40 करोड़ का काम तय हुआ था। इसमें 30 चौराहों पर ट्रैफिक सुधार योजना लागू 2019 में की गई। कंपनी ने करोड़ों के काम की गारंटी नहीं दी। ठेकेदार ने कुछ दिन काम किया और उसे 23 करोड़ का भुगतान हो गया। वहीं, ठेकेदार काम पूरा नहीं कर पाया और एक जुलाई 2021 से ब्लैक लिस्ट कर दिया गया। गारंटी अवधि में दर्ज काम भी नहीं हुआ था। ठेकेदार हेतु तीन साल का टेंडर और सात साल का अनुबंध किया गया था। काम पूरे ही अनुबंधित ठेकेदार को दे दिया गया था, जो आधा अधूरा था।
एक ही कंपनी को बिना टेंडर फिर काम दिया
इसी तरह 2017 में स्मार्ट सिटी ने अजंता उद्योग को बिना टेंडर दिया था। इसमें मल्टी हज़ार्ड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 8 करोड़ 47 लाख का काम दिया गया था। बाद में भुगतान किया गया कि अतिरिक्त उपकरण जोड़ने की जरूरत पड़ी और बिना टेंडर के फिर 8 करोड़ 59 लाख रुपये उपकरण और खरीद के लिए दे दिए। यह नहीं बताया गया कि अतिरिक्त खर्च किस आधार पर था और इसकी निविदा प्रक्रिया क्यों नहीं की गई।
और भी टेंडर में भ्रष्टाचार हुआ था। वहीं, स्मार्ट सिटी ने बाद में जांच की और खुद पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद टेंडर निरस्त कर दिए गए। फिर तीसरी बार टेंडर जारी किए गए और कंपनी को 237 करोड़ में दिया गया। यानी पूर्व टेंडर 201 करोड़ के थे, 36 करोड़ रुपये अधिक में काम दिया गया।
सरकार कह रही है कि हाईकोर्ट के आदेश से भुगतान हुआ, लेकिन ठेकेदार को क्यों दिया गया इसका कारण नहीं बताया गया। कंपनी से पैसे भी चले गए और काम भी नहीं हुआ। ठेका ऐसे ठेकेदार को दिया गया, जो अनुभवहीन था। बाद में वह भाग गया। सरकार कह रही है कि हाईकोर्ट के आदेश से भुगतान हुआ, परंतु यह नहीं बताया गया कि अनुभवहीन ठेकेदार को काम क्यों दिया गया।
निगम ने ही दिया कंपनी का पक्ष—कौने-कौने से बाद में आपत्ति ली
निगम ने अपने बचाव में कहा कि फंड डायवर्ट कराए गए थे। इंदौर नगर निगम ने सड़क निर्माण के लिए 30 करोड़ का काम साल 2013 में दिया था। यह स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट आने से पहले का था। इसके तहत करीब 10 करोड़ का भुगतान किया गया था। वहीं, स्मार्ट सिटी आने पर यह काम कंपनी को दे दिया गया था। बाद में ठेकेदार को 15 करोड़ का भुगतान भी वापस ले लिया गया था। यानी ठेकेदार का बाकी 15 करोड़ का भुगतान भी स्मार्ट कंपनी से ही कराया गया था।



Total Users : 9666
Leave a comment